जंग

दो लोगो के दो अलग विचारो के बीच विवाद होना काफी सामान्य है. हम किसी से विवाद होने के  दौरान उसके सारे जवाबो को तर्क दे कर ख़ारिज करने में कोई  कसर नहीं रखते. सामने वाले की बात सुनने से पहले उसका जवाब  हमारे पास होता है , यह सब सिर्फ इस फिराक में की कब हम अपने आप को सही साबित करे और उस बहस में जीत जाये. जेसे बहस जीत कर हम कोई बड़ी जंग जीत लेंगे

बहस होना आम बात है, हममे से बहुत लोग शायद हर रोज किसी न किसी बहस या विवाद में फस जाते है, कोई जान कर और कोई अनजाने में. दो अलग विचार और अलग बाते अक्सर ऐसी स्थिती ला देती है जिसमे दो अलग अलग बातो में टकराव होता है. दो  विचार हमेशा ही दो लोगो में  होना जरुरी नहीं, कभी कभी ये स्थिती स्वयं के अंदर भी होती है और शायद यही सब से कठिन है क्योकि यहाँ हम किसी और को नहीं बल्कि खुद को ही हरा रहे होते है.

मन में दो अलग बाते होना और उनमे से एक चुनना उतना ही मुश्किल है जितना किसी और से विवाद्  के बाद सामने वाले की बात को मान लेना . अक्सर ऐसे विवादो मे उलझ  कर , एक ही विषय पर दो अलग अलग बाते  हमारे दिमाग में नाचने लगती है.  खुद में चल रही इस लड़ाई में जब हम किसी एक के बारे में सोचते है तो दुसरा विचार जैसे कैची ले कर पहले विचार को काटने दौड़ता है.

तलवारबाजी की तरह ये दो विचार एक दुसरे पर वार करते है पर यहाँ तलवार की आवाज नहीं होती बल्कि इससे खुद के अंदर एक अजीब सी बैचनी पैदा हो जाती है, जिसे शांत करना थोडा मुश्किल लगता है. इसे समय पर या तो सिर्फ हम खुद की मदद कर सकते है या कोई ऐसा जो हमे करीब से जनता हो , जो हमारे लिए सही या गलत की जंग में हमको ये बताये की हम क्या है और जो हम सोच रहे है वो असल में परेशान होने का विषय है भी या सब व्यर्थ है .

वैसे किसी और से पहले ये खुद को जानना जरुरी है, खुद को समझना और समझाना भी . कोई काम करने से पहले अगर मन में उसे न करने के बाहने आरहे है तो उनकी वजह तक सिर्फ हम ही जा सकते है  क्योकि कोई और सिर्फ हमे समझा सकता है लेकिन सामान्यतः किसी की सुनने से पहले हम अपने ही भीतर की आवाज, जो उस काम को नहीं करने के लिए हमे बहला रही होती है , उसे सुन लेते है, इसीलिए किसी और की नहीं बल्कि खुद की सुनना जरुरी है, खुद से सवाल करना ,फिर उनके जवाब पहचान कर खुद पर काम करना जरुरी है . जिस दिन भीतर में चल रही लड़ाई हमने सुलझा ली , हम बाहर की जंग खुद ब खुद सुलझा लेंगे, बस दिल की बात को समझिये तो ज़रा.

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मुंबई से दोस्ती

मुंबई, ये शहर नहीं ये एक कहानी है जो हर किसी के लिए अलग है और ये मुझे यहाँ आकर महसूस हुआ . आज से करीब ७ महीने पहले मै यहाँ अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन के यहाँ आई थी .

माँ के साथ अपना कुछ सामान लिए मै इंदौर से मुंबई चलने वाली अवंतिका एक्सप्रेस मे बैठ तो गयी  लेकिन बैठते ही मन में अजीब सी उलझने चलने लगी . वैसे तो मेरे लिए इंदौर और जयपुर के बाद यह तीसरा शहर था लेकिन फिर भी नये शहर ,नये लोग और नयी चीजों को ले कर मै कुछ घबरायी हुई थी. अपने माता-पिता के सपनो को रंग भरने की ख्वाहिश और दोस्तों की यादे ले कर मै निकल तो पड़ी थी लेकिन रास्ते भर जीवन में आने वाले बदलावों के बारे में सोचती रही . माँ  भी साथ आई थी और उनके सामने मै सामान्य बर्ताव करने की कोशिश में लगी रही .

सुबह ६ बजे बोरेवाली उतरने से पहले ही ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए मन में ख्याल आया की शायद मुझे यहाँ भी दोस्त बनाने में समय लगेगा तो क्यों न इस शहर से ही दोस्ती करलु और ये सोच कर मैने मन ही मन मुंबई से खुब बाते करी.

कुछ देर में हम बोरेवली स्टेशन पर उतारे. उतारते ही पोहे की जगह वडापाव का स्टाल देख कर इंदौर से दूर होने का एहसास हुआ .लोगो से पूछते पूछते हम अँधेरी जाने वाली लोकल तक भी पहुच गये. लेकिन इतनी सुबह  भी स्टेशन पर भारी भीड़ देख कर मेरे मन की बेचैनी और बढ़ गयी. कुछ ही मिनटों में लोकल आते दिखाई दी  ,अचानक पीछे से धक्का लगा और जब तक कुछ समझ आता हम लोकल के अंदर थे.

मैने भीड़ देख कर माँ के हाथ से भारी बेग अपने पास ले लिए लेकिन उसे संभालना अब मुश्किल होगया था. भीड़ के धक्के से मेरे कंधे पर लटका हुआ बेग गिर रहा था लेकिन उसे सही करने के लिए हाथ हिलाने जितनी भी जगह नहीं थी . मेरी सहनशक्ति ख़त्म होने लगी, दम घुट रह था और हाथ इतने बंधे हुए थे की खुद को सभाला नहीं जा रहा था . इतनी भीड़ में भी माँ का पूरा ध्यान सिर्फ मुझ पर था और मेरा स्टेशन पर की कब अँधेरी लगे और हम नीचे उतारे .

१५-२० मिनिट में अँधेरी आया और हम फिर से भीड़ के धक्के के साथ अँधेरी उतर गए. कहने को तो मुंबई में मुझे सिर्फ़ एक घंटा ही हुआ था लेकिन कुछ इस तरह स्वागत किआ था इस शहर ने मेरा जैसे किसी नए दोस्त ने अपनी पुरानी दुश्मनी निकाली हो.

नए स्थान नई जगह नये लोगों के लिए मन की अवधारणा अक्सर नकारात्मक होती है.मुम्बई मेरे सपनो के केनवस पर रंग भरने की सारी सम्भावनाओं को सजोये जीवन की कठिन वास्तविकताओं से रूबरू करने को बेताब सा मेरे स्वागत को तटपर सा लगा . अँधेरी की वह सुबह मुम्बई से मेरी पहचान की प्रथम साक्षी थी . अब मेरे मन की पुलक मुम्बई की खुशनुमा सुबह के साथ मिल कर अपने नए आशियाने की तलाश में थी.